अधिगम का संप्रत्यय (Concept of Learning)

‘Concept’ किसी विचार, सिद्धांत, या वस्तु का सामान्य और स्पष्ट विचार या चित्रण होता है। Concept किसी विशेष वस्तु, स्थिति, पहलू या विचार आदि के बारे में समझ या व्याख्या करने का एक तरीका है, जिससे हमें उस वस्तु, स्थिति, पहलू या विचार आदि को पहचानने, समझने और विश्लेषित करने में सहायता मिलती है। अधिगम के कांसेप्ट को ठीक से समझने के लिए हमें इसके अर्थ, परिभाषा, स्वरुप, विशेषता एवं महत्व आदि को समझना होगा, जिसका वर्णन निचे किया गया है।

अधिगम का शाब्दिक अर्थ

अधिगम दो शब्दों ‘अधि’ और ‘गम से बना है ‘अधि’ का अर्थ है ‘अधिक’ या ‘उच्च’ या ‘बेहतर’ और ‘गम’ का अर्थ है ‘गमन’ या ‘जाना’ या ‘प्राप्त करना’। इस प्रकार, अधिगम का शाब्दिक अर्थ होता है ‘बेहतर प्राप्त करना’ या ‘उच्च स्तरीय ज्ञान एवं कौशल प्राप्त करना’ अथवा पूर्व-ज्ञान को अपेक्षाकृत ज्यादा बेहतर बनाना। ‘Learning’ शब्द अंग्रेज़ी के ‘learn’ (सीखना) क्रिया से निकला है, जिसका अर्थ है समझना, अनुभव करना या अभ्यास के माध्यम से ज्ञान अर्जित करना।

अधिगम की परिभाषा

अनुभव, अभ्यास या अध्ययन के माध्यम से प्राप्त होने वाले ज्ञान, कौशल, या व्यवहार में स्थायी परिवर्तन को अधिगम कहते हैं; अर्थात, जब व्यक्ति अनुभव, अभ्यास या अध्ययन के द्वारा कुछ नया सीखता है तो उसके व्यवहार में कुछ परिवर्तन अवश्य होता है, यदि यह परिवर्तन उसकी सोच या क्रियाओं में स्थायी रूप से शामिल हो जाता है, तो इसे अधिगम की संज्ञा दी जाती है। यहाँ व्यवहार में स्थाई परिवर्तन का आशय है कि, सिखा गया व्यवहार भविष्य में स्वाभाविक रूप से दोहराया जाएगा।

व्यवहार परिवर्तन

व्यवहार परिवर्तन एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति या समूह के कार्य, प्रतिक्रियाएँ या आदतें स्थायी या अस्थायी रूप से बदलती हैं। यह परिवर्तन विभिन्न कारकों, जैसे अनुभव, शिक्षा, सामाजिक दबाव, या पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रभाव से हो सकता है। व्यवहार परिवर्तन एक सक्रिय प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने वर्तमान व्यवहार को समझता है और उसे सुधारने या बदलने के लिए कदम उठाता है। यदि यह परिवर्तन अनुभव, अभ्यास या अध्ययन के माध्यम से होता है तथा स्थायी रूप से होता है तो उसे अधिगम कहा जाता है।

क्या सभी प्रकार का ‘व्यवहार परिवर्तन’ अधिगम है?

सभी प्रकार का व्यवहार परिवर्तन अधिगम नहीं है; क्योंकि, कुछ व्यवहार केवल तात्कालिक परिस्थितियों के कारण बदल सकते हैं, जबकि ‘अधिगम’ अपेक्षाकृत स्थायी प्रक्रिया है।

किस प्रकार का व्यवहार परिवर्तन अधिगम नहीं है,

  • किसी अप्रत्याशित घटना पर तुरंत प्रतिक्रिया या सहायता देना अधिगम नहीं है क्योंकि, यहाँ व्यवहार में परिवर्तन स्थाई नहीं है।
  • यदि कोई व्यक्ति किसी पार्टी में, किसी दबाव में आकर शराब का सेवन करता है, जबकि सामान्यतः वह ऐसा नहीं करता है, तो इसे भी अधिगम की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा, तथा किसी भी मादक पदार्थ के सेवन के कारण प्रदर्शित व्यवहार में परिवर्तन भी अधिगम नहीं है।
  • तनाव या क्रोध की स्थिति में प्रदर्शित होने वाला तात्कालिक व्यवहार परिवर्तन भी अधिगम की श्रेणी में नहीं आता है।
  • आदतों का क्षणिक परिवर्तन भी अधिगम नहीं है, उदहारण के लिए यदि कोई व्यक्ति कुछ विशेष अवसर मात्र पर किसी विशेष तरह का भोजन करता है, जबकि सामान्यतः वह ऐसा नहीं करता है, तो इसे भी अधिगम नहीं कहा जाएगा।
  • जब कोई व्यक्ति संयोग से कुछ करता है किन्तु उसका यह व्यवहार भविष्य में दोहराया नहीं जाता है, तो इसे भी अधिगम की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा।

अधिगम का स्वरुप/प्रकृति एवं विशेषताएं  (Nature  and Characteristics of Learning)

  • अधिगम का मुख्य पहलू यह है कि यह स्थायी परिवर्तन लाता है। यह ज्ञान, कौशल, या व्यवहार में बदलाव को दर्शाता है जो समय के साथ बना रहता है।
  • अधिगम आमतौर पर अनुभवों के माध्यम से होता है। व्यक्ति अपने अनुभवों से सीखता है और उन पर आधारित ज्ञान को विकसित करता है।
  • अधिगम एक सक्रिय प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति को स्वयं सक्रिय रूप से भाग लेना होता है। यह केवल सूचना प्राप्त करने का कार्य नहीं है, बल्कि उसे समझना और लागू करना भी शामिल है।
  • हर व्यक्ति का अधिगम करने का तरीका अलग होता है। कुछ लोग दृश्य सामग्री से बेहतर सीखते हैं, जबकि कुछ श्रवण या क्रियात्मक अनुभवों से; अर्थात यह व्यक्तिगत भिन्नता को सपोर्ट करता है।
  • व्यक्ति का सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश, उसके अधिगम को प्रभावित कर सकता है। अर्थात अधिगम परिवेश पर भी निर्भर करता है।
  • अधिगम बहुआयामी होता है अर्थात यह संज्ञानात्मक, भावनात्मक, सामाजिक एवं अन्य आयामों को भी शामिल करता है।
  • अधिगम एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें समय लगता है। यह तत्काल नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होता है।

अधिगम का महत्व एवं आवश्यकताएँ

  • नवीन ज्ञान को प्राप्त करने तथा पूर्व-ज्ञान को परिमार्जित करते हुए अपने चिन्तन वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समझ को विकसित एवं विस्तारित करने के लिए अधिगम आवश्यक है।
  • विभिन्न कौशलों के विकास और सुधार के लिए अधिगम अत्यन्त आवश्यक है।
  • व्यक्ति को अपने कार्यस्थल पर नई चुनौतियों का सामना करने तथा बेहतर प्रदर्शन के लिए सक्षम बनाने हेतु अधिगम आवश्यक है।
  • अधिगम, व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने में भी सहायक है क्योंकि ज्ञान और कुशलता के जरिये, व्यक्ति अपने निर्णय खुद लेने में समर्थ होता है।
  • अधिगम, व्यक्ति को विभिन्न संस्कृतियों और विचारों के प्रति सहिष्णु एवं संवेदनशील बनाता है।
  • अधिगम से व्यक्ति की ‘समस्या-समाधान’ क्षमता बढ़ती है अर्थात वह नए ज्ञान और दृष्टिकोण से, जटिल समस्याओं का सामना सहनशीलता एवं सरलता से कर सकता है।
  • अधिगम, व्यक्तिगत विकास के लिए आवश्यक है। यह व्यक्ति को, उसके उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अभिप्रेरित करता है।
  • बदलते समय, परिवेश और तकनीकी प्रगति के साथ व्यक्ति को अपडेट रखने में अधिगम अत्यन्त आवश्यक है।

अधिगम के चरण (Steps of learning)

  • सबसे पहले उद्देश्य निर्धारण करना आवश्यक है कि आप क्या सीखना चाहते हैं? जैसे- कोई विशेष कौशल, जानकारी, या ज्ञान।
  • उसके बाद अपने पूर्व ज्ञान का आकलन करें जिससे नए ज्ञान को उससे जोड़ सकें।
  • अब विभिन्न स्रोतों से जानकारी इकट्ठा करें। यह किताबें, ऑनलाइन सामग्री, व्याख्यान या अन्य किसी भी माध्यम से हो सकता है।
  • अधिगम के दौरान सक्रिय रहना आवश्यक है; इसके लिए प्रश्न पूछें, चर्चा में भाग लें तथा ज्ञान को आत्मसात करने के लिए तत्पर रहें।
  • नए सीखे गए कौशल या जानकारी का अभ्यास करना महत्वपूर्ण है। इससे अधिगम में स्थाइत्व आएगा।
  • अपने अधिगम की समीक्षा करें और देखें कि, आपने अपने लक्ष्यों को कितना प्राप्त किया है और कहाँ पर सुधार की आवश्यकता है।
  • शिक्षक, सहपाठी, विशेषज्ञ या अन्य से प्रतिपुष्टि प्राप्त करें जिससे आपको अपनी कमजोरियों को समझने और उसे दूर करने में सहायता मिल सके।
  • सीखे गए ज्ञान या कौशल को अपने व्यवहार में सम्मिलित करें जिससे अधिगम और भी स्थायी हो सके।

अधिगम के प्रकार (Kinds of Learning)

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अधिगम के भिन्न-भिन्न प्रकार बताये हैं। डॉ॰ रॉबर्ट माइल्स गेने (Dr. Robert M. Gagne) द्वारा प्रतिपादित ‘अनुदेशन की नौ घटनाएँ’ (Nine Events of Instruction) तथा ‘अधिगम के आठ प्रकारों’ (Eight kinds of learning) का वर्णन काफी चर्चित रहा है। रॉबर्ट गेने एक प्रमुख अमेरिकी मनोवैज्ञानिक थे इनका जन्म 21 अगस्त 1916 में हुआ था। इन्होने अपनी शिक्षा येल विश्वविद्यालय से प्राप्त की और फिर उन्होंने मनोविज्ञान में डॉ. की उपाधि प्राप्त की। रॉबर्ट गेने ने शिक्षा मनोविज्ञान में अनेक अवधारणाओं को प्रस्तुत किया। 28 अप्रैल 2002 को इनका शरीरान्त हो गया। गेने द्वारा प्रतिपादित अधिगम के आठ प्रकारों का वर्णन इस प्रकार है-

  1. संकेत अधिगम (Signal Learning)

यह अधिगम का सबसे बुनियादी प्रकार है, जिसमें व्यक्ति किसी उद्दीपक/संकेत (stimulus) के प्रति अनुक्रिया (response) को सीखता है। यह प्रक्रिया सामान्यत पावलोव के शास्त्रीय अनुबंधन (Classical Conditioning) के सिद्धांत से मेल खाती है। जिसमें कुत्ता घंटी की आवाज़ सुनकर लार टपकाने लगता है, क्योंकि घंटी को खाने के संकेत के साथ अनुबंधित किया गया था।

  1. उद्दीपक-अनुक्रिया अधिगम (Stimulus-Response Learning)

गेने का यह सिद्धांत बताता है कि कैसे व्यक्ति किसी विशेष उद्दीपक (stimulus) के प्रति एक निश्चित प्रतिक्रिया (response) सीखते हैं। इस सिद्धांत से हमें यह जानने में सहायता मिलती है कि लोग अपने अनुभवों से कैसे सीखते हैं। गेने का यह मानना था कि जब व्यक्ति किसी उत्तेजना के प्रति प्रतिक्रिया करता है, तो उसमें ध्यान, सोच और अनुभूति जैसी मानसिक प्रक्रियाएं भी शामिल होती हैं।

  1. श्रृंखला अधिगम (Chain Learning)

गेने का यह सिद्धांत मनाता है कि, अधिगम के अन्तर्गत प्राणी कई अनुक्रियाओं की एक श्रृंखला को सीखता है। एक अनुक्रिया, अगली अनुक्रिया का संकेत बनती है और इस तरह एक क्रमबद्ध श्रृंखला बनती जाती है। यह सिद्धांत दर्शाता है कि हम कैसे जटिल कार्यों या व्यवहारों को छोटे-छोटे हिस्सों में तोड़कर क्रमबद्ध तरीके से सीख सकते हैं। यह प्रक्रिया किसी विशेष कार्य को सिखाने के लिए एक शक्तिशाली तरीका हो सकती है।

  1. शब्द-साहचर्य अधिगम (Verbal Association)

गेने का यह सिद्धांत है बताता है कि, व्यक्ति किसी शब्द को उसके अर्थ से जोड़कर सीखता है। इस प्रक्रिया में, व्यक्ति शब्दों के साथ अपनी समझ और अनुभवों को जोड़ता है, जिससे उसकी भाषा क्षमता और संज्ञानात्मक क्षमताएँ बेहतर होती हैं। यह विशेष रूप से बच्चों के भाषाई विकास, शब्दावली के विस्तार और संज्ञानात्मक विकास के लिए आवश्यक है। जैसे- जब बच्चा ‘सेब’ शब्द सीखता है तो इसे असली सेब के साथ जोड़ता है।

  1. विभेदात्मक अधिगम (Discrimination Learning)

विभेदात्मक अधिगम में प्राणी यह सीखता है कि विभिन्न उद्दीपकों के बीच भेद कैसे किया जाए अर्थात वह सीखता है कि, किन परिस्थितियों में उसे विभिन्न अनुक्रियाएँ करनी हैं। इसमें व्यक्ति या प्राणी यह समझता है कि कुछ विशेष उत्तेजनाएँ एक विशिष्ट अनुक्रिया को प्रेरित करती हैं, जबकि अन्य उत्तेजनाएँ किसी दूसरी अनुक्रिया को उत्पन्न कर सकती हैं। जैसे- छात्र ‘वृत्त’ और ‘दीर्घवृत्त’ के बीच अंतर करना सीखता है। अधिगम के इस प्रकार को एक चयनात्मक प्रक्रिया (selective process) कहा जा सकता है क्योंकि इसमें व्यक्ति यह पहचानता है कि किस उत्तेजना के प्रति कौन सी अनुक्रिया उपयुक्त होगी।

  1. सम्प्रत्यय/अवधारणा अधिगम (Concept Learning)

अधिगम के इस प्रकार में व्यक्ति किसी विशेष विचार, श्रेणी या वर्ग को पहचानने और समझने के लिए एक सामान्य नियम या विशेष गुण सीखता है। अर्थात इस प्रकार के अधिगम में व्यक्ति यह सीखता है कि, किसी वस्तु, घटना या विचार को एक निश्चित श्रेणी में कैसे वर्गीकृत किया जा सकता है। यह अधिगम प्रक्रिया संज्ञानात्मक (cognitive) होती है और इसमें व्यक्ति को किसी विशिष्ट श्रेणी के तत्वों और उनके गुणों के बीच संबंध स्थापित करना होता है।

  1. नियम अधिगम (Principle/Rule Learning)

गेने का नियम अधिगम बताता है कि व्यक्ति विभिन्न घटनाओं और उदाहरणों के आधार पर सामान्य नियमों को सीखता है, जिन्हें वह भविष्य में उपयोग करता है। यह अधिगम प्रक्रिया व्यक्ति को विभिन्न परिस्थितियों में सही प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाती है। अर्थात इस अधिगम में प्राणी यह सीखता है कि, किसी विशेष स्थिति या उद्दीपक के आधार पर कौन सा नियम लागू होगा और उसके अनुसार किस प्रकार की अनुक्रिया को बेहतर होगी। यह एक संज्ञानात्मक और संगठनात्मक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति कई उदाहरणों और अनुभवों के आधार पर एक सामान्य नियम बनाता है।

  1. समस्या समाधान अधिगम (Problem Solving Learning)

यह अधिगम का उच्च स्तर है, इसमें व्यक्ति किसी समस्या का समाधान खोजने के लिए विभिन्न चरणों से गुजरता है। इसमें व्यक्ति को समस्या का विश्लेषण कर उपयुक्त समाधान खोजना होता है और प्राप्त समाधान का मूल्यांकन करना होता है। गेने के अनुसार, समस्या समाधान एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपनी ज्ञान, अनुभव और उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके समस्याओं को हल करता है। यह सिद्धांत बताता है कि किसी भी समस्या का समाधान ढूंढ़ने के लिए व्यक्ति को एक व्यवस्थित और रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाना होता है। यह संज्ञानात्मक प्रक्रिया व्यक्ति को समस्याओं का विश्लेषण करने, समाधान के विकल्पों का निर्माण करने और सबसे उपयुक्त समाधान को आत्मसात करने में सहायता करती है।

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक

अधिगम, अनेक कारकों से प्रभावित होता है, जो भिन्न-भिन्न शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक और पर्यावरणीय आदि तत्वों से सम्बन्धित होते हैं। ये कारक अधिगम की गति, मात्रा, गुणवत्ता तथा उसकी सफलता आदि को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। अधिगम को प्रभावित करने वाले कुछ प्रमुख कारकों का वर्णन इस प्रकार है-

अभिप्रेरणा (Motivation)

आंतरिक और बाह्य अभिप्रेरणा अधिगम की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है, किन्तु इनके प्रभाव में भिन्नता होती है। जब व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए अपनी रुचि, आनंद या आत्म-संतोष के कारण अभिप्रेरित होता है तो इसे आतंरिक अभिप्रेरणा (Intrinsic Motivation) कहा जाता है। जब व्यक्ति किसी सन्दर्भ में आंतरिक रूप से प्रेरित होता है, तो वह किसी कार्य पर स्वेच्छा से ज्यादा प्रयास और समय खर्च करता है; इस कारण अधिगम प्रक्रिया अपेक्षाकृत ज्यादा स्थायी और प्रभावी होती है।

जब व्यक्ति बाहरी पुरस्कार, प्रशंसा या दबाव के कारण किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित होता है तो इसे बाह्य अभिप्रेरणा (Extrinsic Motivation) कहते हैं। बाह्य अभिप्रेरणा तात्कालिक लक्ष्यों की ओर आकर्षित करती है, जैसे परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना या किसी पुरस्कार को हासिल करना। बाह्य प्रेरणा, आन्तरिक की तुलना में अपेक्षाकृत कम दीर्घकालिक होती है किन्तु इससे अधिगम में जल्दी परिणाम दिखने की सम्भावना होती है।

अतः कहा जा सकता है कि, आंतरिक अभिप्रेरणा से होने वाले अधिगम, ज्यादा दीर्घकालिक और गहन होते हैं; जबकि बाह्य अभिप्रेरणा तात्कालिक लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक होती है। दोनों प्रकार की अभिप्रेरणा के संतुलित प्रयोग से अधिगम को ज्यादा प्रभावशाली तथा स्थायी बनाया जा सकता है।

ध्यान और एकाग्रता (Attention and Concentration)

ध्यान और एकाग्रता अधिगम की प्रक्रिया में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि ये मानसिक संसाधनों के बेहतर उपयोग में सहायक होते हैं तथा सीखने की क्षमता को बढ़ाते हैं। ध्यान वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम किसी विशेष जानकारी पर फोकस करते हैं, और बाकी की जानकारी को अनदेखा करते हैं। जब हम किसी विषय या गतिविधि में पूरी तरह से ध्यान केंद्रित करते हैं, तो मस्तिष्क अधिक प्रभावी तरीके से जानकारी को संसाधित और संग्रहित करता है, इससे अधिगम की गुणवत्ता एवं मात्रा बढ़ जाती है।

एकाग्रता, ध्यान का विस्तृत रूप है। यह उस स्थिति को दर्शाता है जब व्यक्ति पूरी तरह से किसी एक कार्य पर अपना ध्यान केंद्रित करता है। उच्च स्तर की एकाग्रता से व्यक्ति को सामग्री को बेहतर तरीके से समझने, याद रखने और समस्याओं को सुलझाने में सहायता मिलती है और अधिगम ज्यादा बेहतर होता है; वहीं जब एकाग्रता में कमी होती है तो अधिगम की प्रक्रिया में बाधा  उत्पन्न होती है। अतः कहना ठीक होगा कि, ध्यान और एकाग्रता दोनों मिलकर अधिगम को अधिक प्रभावी बनाते हैं।

शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य

स्वस्थ शरीर से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में सुधार होता है इस कारण ध्यान, स्मृति और सोचने की क्षमता बेहतर होती है। शारीरिक बीमारी, जैसे थकान या कमजोरी, मस्तिष्क की कार्य प्रणाली को प्रभावित करती है जिससे अधिगम की प्रक्रिया में विघ्न पड़ता है। मानसिक स्वास्थ्य, जैसे मानसिक शांति और तनाव रहित अवस्था आदि, सीखने की प्रक्रिया अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब कोई व्यक्ति चिंता, अवसाद या मानसिक तनाव, से ग्रसित होता है तो उसकी ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे अधिगम प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

अधिगम शैली (Learning Style)

अधिगम शैली, सीखने की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है। प्रत्येक व्यक्ति की अधिगम शैली में भिन्नता होती है। अधिगम शैलियाँ मुख्य रूप से तीन होती हैं; श्रव्य (Auditory), दृश्य (Visual) तथा संवेदनात्मक या गतिक (Kinesthetic)। दृश्य अधिगम शैली में रेखाचित्र, और आरेख आदि के माध्यम से अधिगम की प्रधानता होती है। श्रव्य अधिगम शैली में सुनकर और बातचीत के माध्यम से सीखने की प्रधानता होती है, जबकि काइनेस्थेटिक अधिगम शैली में लोग शारीरिक गतिविधियों तथा अनुभव से सीखने में अधिक सक्षम होते हैं। इन अधिगम शैलियों के अनुरूप, अध्ययन विधियों का प्रयोग करते हुए सीखने की प्रक्रिया को प्रभावी और स्थायी बनाया जा सकता है।

अधिगम का उद्देश्य (Learning Purpose)

अधिगम का उद्देश्य सीखने की प्रक्रिया को प्रमुखता से प्रभावित करता है। जब उद्देश्य स्पष्ट होते हैं, तो सीखने की प्रक्रिया ज्यादा संगठित और प्रभावी होती है। यदि उद्देश्य स्पष्ट होता है तो व्यक्ति अपनी ऊर्जा और प्रयासों को उसी दिशा में केंद्रित करता है। उद्देश्य की अस्पष्टता अधिगम को अव्यवस्थित बना देती है इस कारण सिखने की प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जबकि स्पष्ट उद्देश्य व्यक्ति को ज्यादा अभिप्रेरित तथा अनुशासित रखते हैं, इस कारण सीखने की गुणवत्ता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

स्मृति (Memory)

स्मृति, अधिगम को स्थायी रूप से प्रभावित करती है, क्योंकि स्मृति जितनी बेहतर होगी, व्यक्ति जानकारी को संकलित करने तथा उसे आवश्यकतानुरूप पुनः प्राप्त करने में उतना ही ज्यादा सक्षम होगा अर्थात उसके अधिगम की गुणवत्ता उतनी ही बेहतर होगी। स्मृति का विकास निरन्तर अभ्यास एवं पुनरावृत्ति तथा व्यवस्थित तरीके से अध्ययन करने से होता है। यदि व्यक्ति का पूर्व ज्ञान बेहतर होता है तो नवीन ज्ञान एवं तथ्य को पूर्व ज्ञान से जोड़ने में सरलता होती है। इसके विपरीत, कमजोर स्मृति व्यक्ति की अधिगम क्षमता को बाधित करती है। यदि जानकारी सही तरीके से संचित न हो तो उसे याद रखना तथा प्रयोग करना कठिन हो जाता है और इससे अधिगम की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

सीखने की तकनीक (Learning Techniques)

अधिगम प्रक्रिया, सीखने की तकनीक से भी महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित होती है, क्योंकि उपयोगी एवं उचित तकनीक के चयन से अधिगम को प्रभावी और सशक्त बनाया जा सकता है। जब व्यक्ति उपयुक्त तकनीक अपनाता है, तो जानकारी सरल और स्थायी रूप से मस्तिष्क में संचित होती है। जबकि, गलत तकनीक के उपयोग से अधिगम मंद पड़ सकता है। कुछ प्रभावी तकनीकों में माइंड मैपिंग, स्वयं परीक्षण, समस्या-समाधान एवं समूह-चर्चा आदि को रखा जा है।

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